स्टार्टअप अर्थव्यवस्था का भारत में रोजगार और नवाचार पर प्रभाव
DOI:
https://doi.org/10.64880/tvsjiir.v1i2.05Keywords:
स्टार्टअप, रोजगार, नवाचार, उद्यमिता, Startup India, पेटेंट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, वित्तीय तकनीक, युवा रोजगार, भारतीय अर्थव्यवस्था।Abstract
पिछले एक दशक में भारत की अर्थव्यवस्था में स्टार्टअप क्षेत्र एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तनकारी शक्ति के रूप में उभरा है। स्टार्टअप अब केवल सूचना प्रौद्योगिकी अथवा ई-कॉमर्स तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, जैव प्रौद्योगिकी, वित्तीय तकनीक, अंतरिक्ष, रक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वच्छ ऊर्जा, परिवहन, खाद्य प्रसंस्करण और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में भी सक्रिय हैं। इससे स्टार्टअप अर्थव्यवस्था का प्रभाव रोजगार सृजन, उद्यमिता, तकनीकी नवाचार, नए उत्पादों के विकास तथा स्थानीय समस्याओं के समाधान तक विस्तृत हुआ है। भारत सरकार के अनुसार 31 मार्च 2026 तक उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग द्वारा मान्यता प्राप्त स्टार्टअप की संख्या 2.23 लाख से अधिक हो चुकी थी और इन स्टार्टअप द्वारा 23.36 लाख से अधिक प्रत्यक्ष रोजगार सृजित किए जाने की सूचना दी गई थी। केवल वित्तीय वर्ष 2025-26 में 55,200 से अधिक नए स्टार्टअप को मान्यता मिली और इनके द्वारा 4.99 लाख से अधिक प्रत्यक्ष रोजगार दर्ज किए गए। जून 2026 तक मान्यता प्राप्त स्टार्टअप की संख्या 2.3 लाख से अधिक हो चुकी थी और लगभग आधे मान्यता प्राप्त स्टार्टअप टियर-दो तथा टियर-तीन शहरों से जुड़े बताए गए।
नवाचार के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिला है। विश्व बौद्धिक संपदा संगठन के वैश्विक नवाचार सूचकांक 2025 में भारत 139 अर्थव्यवस्थाओं में 38वें स्थान पर रहा, जबकि 2020 में भारत 48वें स्थान पर था। भारत निम्न-मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में प्रथम स्थान पर रहा और उसके चार नवाचार समूह—बेंगलुरु, दिल्ली, मुंबई और चेन्नई—विश्व के शीर्ष 100 नवाचार समूहों में सम्मिलित हुए। वित्तीय वर्ष 2025-26 तक स्टार्टअप द्वारा 19,400 से अधिक पेटेंट आवेदन दाखिल किए जा चुके थे। प्रस्तुत अध्ययन द्वितीयक आँकड़ों पर आधारित वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक शोध है। इसमें DPIIT, आर्थिक सर्वेक्षण, Startup India, WIPO तथा अन्य आधिकारिक स्रोतों का प्रयोग किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि स्टार्टअप अर्थव्यवस्था भारत में रोजगार तथा नवाचार का महत्त्वपूर्ण स्रोत बन रही है, किंतु पूँजी की असमान उपलब्धता, स्टार्टअप विफलता, अनुसंधान एवं विकास पर कम व्यय, कौशल-अंतर, क्षेत्रीय असमानता और रोजगार की गुणवत्ता जैसी चुनौतियों पर ध्यान दिए बिना इसका पूर्ण सामाजिक-आर्थिक लाभ प्राप्त नहीं किया जा सकता।